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भीष्म पर्व
अध्याय ११०
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सञ्जय़ उवाच
शल्यश्च समरे जिष्णुं कृपश्च रथिनां वरः |  ६   क
विव्यधाते महावाहुं वहुधा मर्मभेदिभिः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति