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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
विद्राव्य च वहूनश्वान्नागा राजन्वलोत्कटाः |  ५२   क
विषाणैश्चापरे जघ्नुर्ममृदुश्चापरे भृशम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति