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द्रोण पर्व
अध्याय ११०
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सञ्जय़ उवाच
ते समन्तान्महावाहुं परिवार्य वृकोदरम् |  ३०   क
दिशः शरैः समावृण्वञ्शलभानामिव व्रजैः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति