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द्रोण पर्व
अध्याय ११०
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धृतराष्ट्र उवाच
वसुषेणसहाय़ं मां नालं देवापि संय़ुगे |  ४   क
किमु पाण्डुसुता राजन्गतसत्त्वा विचेतसः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति