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आदि पर्व
अध्याय १११
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् |  १   क
सिद्धचारणसङ्घानां वभूव प्रिय़दर्शनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति