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आदि पर्व
अध्याय १११
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वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति साधवः |  ३१   क
आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति