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आदि पर्व
अध्याय ५९
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वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः |  ५३   क
श्रोतव्यश्चैव सततं श्राव्यश्चैवानसूय़ता ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति