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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
वाय़ोस्तेजस्ततश्चापस्त्वद्भ्यो हि वसुधोद्गता |  २६   क
मूलप्रकृतय़ोऽष्टौ ता जगदेतास्ववस्थितम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति