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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
सहदेवं च निर्जित्य शरैः संनतपर्वभिः |  ७०   क
कृपय़ा विरथं कृत्वा नाहनद्धर्मवित्तय़ा ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति