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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
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कुन्त्यु उवाच
विषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादय़ः |  १२   क
यदैषा नाथमिच्छन्ती व्यलपत्कुररी यथा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति