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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्ण मद्वचनं तात शृणु सत्यभृतां वर |  १०   क
व्रुवतोऽद्य महावाहो सौहृदात्परमं हितम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति