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वन पर्व
अध्याय १११
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
कौश्यां वृस्यामास्स्व यथोपजोषं; कृष्णाजिनेनावृताय़ां सुखाय़ाम् |  १०   क
क्व चाश्रमस्तव किं नाम चेदं; व्रतं व्रह्मंश्चरसि हि देववत्त्वम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति