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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तद्गतेन मनसा वभूव क्षुभितेन्द्रिय़ः |  ४४   क
पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं यय़ौ ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति