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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
स देवस्तपसा चैव वीर्येण च समन्वितः |  १७   क
ववृधेऽतीव राजेन्द्र चन्द्रवत्प्रिय़दर्शनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति