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वन पर्व
अध्याय १११
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लोमश उवाच
अथर्श्यशृङ्गं विकृतं समीक्ष्य; पुनः पुनः पीड्य च काय़मस्य |  १७   क
अवेक्षमाणा शनकैर्जगाम; कृत्वाग्निहोत्रस्य तदापदेशम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति