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वन पर्व
अध्याय १११
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लोमश उवाच
तस्यां गताय़ां मदनेन मत्तो; विचेतनश्चाभवदृश्यशृङ्गः |  १८   क
तामेव भावेन गतेन शून्यो; विनिःश्वसन्नार्तरूपो वभूव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति