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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
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अर्जुन उवाच
पिता तु मे वसून्गत्वा त्वदर्थं समय़ाचत |  १७   क
पुनः पुनः प्रसाद्यैनांस्त एनमिदमव्रुवन् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति