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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
तवात्मजांस्तु पतितान्दृष्ट्वा कर्णः प्रतापवान् |  १   क
क्रोधेन महताविष्टो निर्विण्णोऽभूत्स जीवितात् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति