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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
वहुभिर्वहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत् |  ७५   क
अस्य देवस्य यद्वक्त्रं समुद्रे तदतिष्ठत ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति