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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुता राजञ्श्रुत्वा भ्रातुर्वचो द्रुतम् |  १७   क
अभ्ययुः पाण्डवं युद्धे विसृजन्तः शिताञ्शरान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति