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द्रोण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मम जय़ो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति |  १८   क
अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति