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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहतान्पुत्रांस्तव राजन्महारथान् |  २०   क
अश्रुपूर्णमुखः कर्णः कश्मलं समपद्यत ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति