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उद्योग पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थय़ुक्ता लोकेऽस्मिन्प्रवृत्तिर्लक्ष्यते सताम् |  ९   क
असतां विपरीता तु लक्ष्यते भरतर्षभ ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति