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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |  २१   क
अभ्ययात्पाण्डवं युद्धे त्वरमाणः पराक्रमी ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति