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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
स भीमं पञ्चभिर्विद्ध्वा राधेय़ः प्रहसन्निव |  ३   क
पुनर्विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति