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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
ततः शरसहस्रेण धनुर्मुक्तेन भारत |  ३२   क
पाण्डवो व्यकिरत्कर्णं घनोऽद्रिमिव वृष्टिभिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति