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द्रोण पर्व
अध्याय १११
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सञ्जय़ उवाच
अवहासं तु तं पार्थो नामृष्यत वृकोदरः |  ४   क
ततो विव्याध राधेय़ं शतेन नतपर्वणाम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति