आदि पर्व  अध्याय ११२

वैशम्पाय़न उवाच

न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथञ्चन |  २   क
धर्मपत्नीमभिरतां त्वय़ि राजीवलोचन ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति