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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
आश्रमे यो द्विजं हन्याद्गां वा दद्यादनाश्रमे |  १४   क
किं नु तत्पातकं न स्यात्तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति