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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
ऋषय़श्चापि देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा |  १७   क
लिङ्गमेवार्चय़न्ति स्म यत्तदूर्ध्वं समास्थितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति