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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
किं तु स्वेनास्मि सन्तुष्टो दुःखा वृत्तिरनुष्ठिता |  २९   क
सेवाय़ाश्चापि नाभिज्ञः स्वच्छन्देन वनेचरः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति