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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम् |  २२   क
वदन्ति जगतोऽध्यक्षमक्षरं परमं पदम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति