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शान्ति पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेन हि विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः |  १८   क
व्युच्छिद्यन्ते क्रिय़ाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति