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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
दुःखेन श्लेष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते |  ८१   क
भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति