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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
कश्चिदेव हि भीतस्तु दृश्यते न परात्मनोः |  ८२   क
कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावाः स्निग्धास्तु दुर्लभाः ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति