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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
अकस्मात्प्रक्रिय़ा नॄणामकस्माच्चापकर्षणम् |  ८४   क
शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकर्तुं वुद्धिलाघवात् ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति