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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते |  १००   क
क्रौञ्चः कार्पासिकं हृत्वा मृतो जाय़ति मानवः ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति