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अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
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युधिष्ठिर उवाच
दत्तं किं फलवद्राजन्निह लोके परत्र च |  ३   क
भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति