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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो निह्नवति मानवः |  १०४   क
स गतासुर्नरस्तादृङ्मत्स्ययोनौ प्रजाय़ते ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति