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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
असंवासाः प्रजाय़न्ते म्लेच्छाश्चापि न संशय़ः |  १०८   क
नराः पापसमाचारा लोभमोहसमन्विताः ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति