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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
एतन्मय़ा महाराज व्रह्मणो वदतः पुरा |  ११२   क
सुरर्षीणां श्रुतं मध्ये पृष्टश्चापि यथातथम् ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति