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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
मय़ापि तव कार्त्स्न्येन यथावदनुवर्णितम् |  ११३   क
एतच्छ्रुत्वा महाराज धर्मे कुरु मनः सदा ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति