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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते |  २२   क
शरीरं वर्जय़न्त्येते जीवितेन विवर्जितम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति