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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
आसन्नमात्रः सततं तैर्भूतैरभिभूय़ते |  २९   क
विप्रमुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् |  २९   ख
स तु भूतसमाय़ुक्तः प्राप्नुते जीव एव ह ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति