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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते |  ३५   क
ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति