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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
ततोऽहं तप आस्थाय़ तोषय़ामास शङ्करम् |  ८६   क
दिव्यं वर्षसहस्रं तु पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति