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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
स्निग्धाञ्जनचय़ाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् |  २७   क
पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् |  २७   ख
व्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति