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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रिय़ा जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम् |  १   क
सप्तर्षिपत्न्यः षड्देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति