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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
कृमिभावात्प्रमुक्तस्तु ततो जाय़ति गर्दभः |  ४४   क
गर्दभः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि सूकरः |  ४४   ख
श्वा वर्षमेकं भवति ततो जाय़ति मानवः ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति