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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे |  ५०   क
आत्मनः कामकारेण सोऽपि हंसः प्रजाय़ते ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति