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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
मातापितरमाक्रुश्य सारिकः सम्प्रजाय़ते |  ५३   क
ताडय़ित्वा तु तावेव जाय़ते कच्छपो नृप ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति