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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यकः |  ५४   क
व्यालो भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जाय़ति मानुषः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति